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छत्रपति शिवाजी महाराज - प्रजा का राजा ।

छत्रपति शिवाजी महाराज - प्रजा का राजा 

छत्रपति शिवाजी महाराज - प्रजा का राजा
छत्रपति शिवाजी महाराज - प्रजा का राजा

प्रजा के सुख के लिए : 

      शिवाजी महाराज को बचपन में अपने पिता से केवल छोटी - सी जागीर मिली थी । इस छोटी - सी जागीर से उन्होंने स्वराज्य का निर्माण किया । उन्होंने बचपन में लोगों की यातनाएँ देखी थीं । इसलिए उन्होंने लोगों को जागृत किया और उन्हें स्वाभिमानी बनाया । उन्होंने लोगों को संगठित किया । उन्होंने अपने प्राण खतरे में डाले और बलाढ्य शत्रुओं को पराजित करके न्यायपूर्ण स्वराज्य का निर्माण किया । उस स्वराज्य को अच्छी व्यवस्था प्रदान की । इस कारण प्रजा सुखी हुई ।

 सेवकों से प्रेम : 

      शिवाजी महाराज को अपने सेवकों से बड़ा प्रेम था । बाजीप्रभु ने देश के लिए मृत्यु को गले लगाया । शिवाजी महाराज ने उनके बेटों का पालन - पोषण किया । तानाजी ने देश के लिए आत्मबलिदान किया । शिवाजी महाराज ने स्वयं उनके गाँव जाकर रायबा की शादी करवा दी । रायबा को ममता की छत्रछाया में रखा । आगरा की कैद में मदारी मेहतर ने अपनी जान खतरे में डाली । शिवाजी महाराज ने अंत तक उसे अपने साथ रखा । प्रतापराव गुजर ने स्वराज्य के लिए बलिदान दिया । शिवाजी महाराज ने अपने दूसरे बेटे राजाराम का विवाह प्रतापराव गुजर की बेटी से किया । ऐसी कितनी कहानियाँ कहें ? शिवाजी महाराज राजा थे लेकिन अपने सेवकों की उन्होंने पिता की तरह रक्षा की ।
छत्रपति शिवाजी - प्रजा का राजा ।
छत्रपति शिवाजी महाराज - प्रजा का राजा

प्रजा की रक्षा : 

       यह उस समय की बात है , जब शाइस्ता खान ने स्वराज्य पर आक्रमण किया । खान की सेना फसलों को पैरों तले रौंदती , लोगों को कष्ट देती तथा आसपास के प्रदेशों को नष्ट करती हुई आ रही थी । शिवाजी महाराज को प्रजा की चिंता हुई । उन्होंने अपने सरदारों को लिखा , “ सारी प्रजा को घाट के नीचे भेजो । जहाँ सुरक्षित जगह हो , वहाँ लोगों को भेज दो । आलस मत करो । इस काम के लिए दिनरात एक कर दो । गाँव - गाँव में जाओ । लोगों की सहायता करो । यदि मुगलों ने लोगों को बंदी बनाया तो उस पाप के लिए आप सब उत्तरदायी होंगे । शिवाजी महाराज ने अपनी प्रजा के प्रति माँ जैसी ममता रखी ।
छत्रपति शिवाजी - प्रजा का राजा ।
छत्रपति शिवाजी - प्रजा का राजा ।

अच्छे कार्य जो उन्होंने किए : 

      पुरानी पद्धतियों में से बुराइयों को | दूर कर अच्छी पद्धति का निर्माण करना शिवाजी महाराज के शासन की विशेषता थी । देशमुख , देशपांडे और इनामदार आदि को महसूल ( राजस्व ) इकट्ठा करने का अधिकार था । वे किसानों से अधिक - से - अधिक ज्यादा महसूल ( राजस्व ) वसूल करते थे । इससे सामान्य किसानों की दुर्दशा होती थी । शिवाजी महाराज ने इस पद्धति को बंद कर दिया । उन्होंने भूमि का लगान निश्चित कर दिया । निश्चित किए हुए लगान से अधिक लगान वसूल करनेवाले अधिकारियों को कठोर दंड दिए । जागीरदारी प्रथा बंद करने का प्रयत्न किया । उनकी राय में यह पद्धति स्वराज्य के लिए घातक थी । उन्होंने सूबेदार से कमाविसदार तक सभी अधिकारियों को नकद वेतन देने की पद्धति शुरू की ।

कठोर अनुशासन :

        राज्य में कहाँ क्या चल रहा है , इसकी शिवाजी महाराज को पूरी जानकारी रहती थी । उनके गुप्तचर बड़े चतुर थे । गद्दारों के कारण राज्य को बड़ा खतरा रहता है । इसलिए शिवाजी महाराज ने गद्दारी करनेवाले लोगों के लिए कड़े दंड निर्धारित किए थे । उनका अनुशासन कठोर था । सैनिकों को स्पष्ट आदेश था कि वे प्रजा को कष्ट न दें और उसे लूटें नहीं । नियमों को भंग करनेवालों को वे कठोर सजा देते थे ।
छत्रपति शिवाजी - प्रजा का राजा ।
छत्रपति शिवाजी - प्रजा का राजा ।

दयालु शिवाजी महाराज : 

       शिवाजी महाराज जैसे महान पराक्रमी थे वैसे ही वे बड़े उदार भी थे । स्वराज्य के काम में उन्होंने सभी जाति पाँति के लोगों को अपनाया । उन्होंने सभी जातियों के लोगों को स्वराज्य के प्रशासन में स्थान दिया । धर्म और जाति आदि को ध्यान में न रखकर केवल मनुष्य की योग्यता देखकर ही वे उसे नौकरी में रखते थे । शिवाजी महाराज की नौसेना में जिस तरह कोली और भंडारी आदि थे उसी तरह मुसलमान भी थे । उन्होंने महार , रामोशी आदि लोगों को भी स्वराज्य के कामकाज में नियुक्त किया । राज्य का प्रशासन उन्होंने ब्राह्मण और प्रभु समाज के लोगों को सौंपा था । शिवाजी महाराज की सेना में जिस प्रकार  हेटकरी थे , मराठे थे , उसी प्रकार मुसलमान भी थे । उनकी थल सेना का नूर बेग प्रमुख सेनानी था । नौसेना का अधिकारी दौलत खान , सिद्दी मिसरी तथा उनका एक वकील काजी हैदर मुसलमान ही थे ये सभी स्वराज्य के निष्ठावान सेवक थे ।  युद्ध अभियान के बीच शिवाजी महाराज ने मसजिदों का कभी नुकसान नहीं किया । यदि कभी कुरआन शरीफ की कोई प्रति उन्हें मिलती तो वे बड़े सम्मानपूर्वक उसे किसी मुसलमान को सौंप देते थे । युद्ध में हारे हुए पक्ष की औरतों और बच्चों की प्रतिष्ठा पर उन्होंने कभी आँच नहीं आने दी ।

 उदार धार्मिक नीति : 

        शिवाजी महाराज का धार्मिक दृष्टिकोण बड़ा । उदार था । केवल मुसलमान होने के कारण वे कभी किसी से दुवेष नहीं करते थे । यदि किसी ने धर्म परिवर्तन किया और वह पुन : अपने धर्म में वापस आना चाहता है शिवाजी महाराज उसे कभी रोकते नहीं थे । बजाजी नाईक निंबालकर शिवाजी महाराज का साला था । वह बीजापुर के आदिलशाह  की नौकरी में था । आदिलशाह ने उसका धर्म परिवर्तन किया था । बजाजी । बीजापुर में रहने लगा । उसे किसी चीज की कमी नहीं थी पर यह बात उसके मन को कचोटती थी कि उसने अपना धर्म बदला है । उसे यह बुरा लगता था । एक दिन फिर से वह अपने धर्म में वापस आ गया । शिवाजी महाराज ने उसको दूर नहीं रखा बल्कि उसे फिर से अपनाया । नेतोजी पालकर की कहानी भी ऐसी ही है । नेतोजी पालकर का धर्म बदला गया था लेकिन उसे फिर से अपने धर्म में आने की इच्छा हुई । शिवाजी महाराज ने उसे दूर नहीं रखा । उसे फिर से अपने धर्म में ले लिया ।
छत्रपति शिवाजी - प्रजा का राजा ।
छत्रपति शिवाजी महाराज

   शिवाजी महाराज का स्मरणीय स्वरूप :

        गहन अधकार में अपनी दिशा निश्चित करके मार्ग निकालना , संकट आने पर भयभीत न होते हुए उनपर विजय प्राप्त करना और आगे बढ़ना , शक्तिशाली शत्रु के साथ अपनी अल्प शक्ति से लड़ते - लड़ते अपना सामर्थ्य बढ़ाते रहना ; साथियों को उत्साह देते हुए और शत्रुओं को चकमा देते हुए यश प्राप्त करना आदि सभी गुण शिवाजी महाराज में विद्यमान थे । आदर्श पुत्र , सजग नेता , कुशल संगठनकर्ता , जनकल्याण करनेवाला प्रशासक , बुधिमान युद्ध वीर , दुर्जनों के संहारक , सज्जनों के रक्षक और नवयुग का निर्माता जैसे शिवाजी महाराज के व्यक्तित्व के कई तेजस्वी पहलू हैं । इन्हें देखने पर मन में बार - बार यही भाव उठता है कि :
"शिवाजी महाराज का याद करें रूप ।
 शिवाजी महाराज का याद करें प्रताप । । ”
छत्रपति शिवाजी - प्रजा का राजा ।

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